Matamaha Shraddh: 11 अक्टूबर 2026 को मातामह श्राद्ध, नानी-नाना की तृप्ति से कटता है 'मातृ दोष', जानें घटस्थापना के दिन क्यों होता है यह खास श्राद्ध
07 Oct 2026, 01:27 PM

Matamaha Shraddh: 11 अक्टूबर 2026 को मातामह श्राद्ध, नानी-नाना की तृप्ति से कटता है 'मातृ दोष', जानें घटस्थापना के दिन क्यों होता है यह खास श्राद्ध

ABP News
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<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="1"><strong data-path-to-node="1" data-index-in-node="0">नवरात्रि घटस्थापना के साथ संपन्न होगा नाना-नानी का तर्पण; जानें किन परिस्थितियों में पुत्री और दौहित्र कर सकते हैं पिंडदान.</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="3">आश्विन शुक्ल प्रतिपदा यानी शारदीय नवरात्रि की घटस्थापना के साथ अधिकांश घरों में <strong data-path-to-node="3" data-index-in-node="80">मातामह श्राद्ध</strong> किया जाएगा. यह श्राद्ध पितृ पक्ष की औपचारिक समाप्ति के ठीक अगले दिन, 11 अक्तूबर 2026 को संपन्न होगा. सनातन धर्म परंपरा में सर्व पितृ, मातामह (नाना) और मातामही (नानी) के निमित्त किया जाने वाला यह श्राद्ध अत्यंत कल्याणकारी और मातृ ऋण से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="4">जयपुर-जोधपुर स्थित पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान के निदेशक ज्योतिषाचार्य एवं कुंडली विश्लेषक <strong data-path-to-node="4" data-index-in-node="90">डा. अनीष व्यास</strong> के अनुसार, परिजनों की स्मृति में तिथि अनुसार तर्पण और श्राद्ध करने का विधान है. जिन परिवारों में पुत्र संतान नहीं होती, वहां नाती (दौहित्र) को तर्पण और पिंडदान करने का पूर्ण शास्त्रीय अधिकार प्राप्त है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="4"><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/qC5oxd58sbM?si=fzZN32-81aHNmgiR" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<h2 style="text-align: justify;" data-path-to-node="6">क्या है मातामह श्राद्ध और इसकी अनिवार्य शर्तें?</h2>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="7">मातामह श्राद्ध मुख्य रूप से एक पुत्री द्वारा अपने पिता तथा नाती द्वारा अपने नाना के निमित्त किया जाने वाला तर्पण है. इसे परिवार में सुख, शांति और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="8">धर्म शास्त्रों में इस श्राद्ध के लिए कुछ विशेष नियम और अनिवार्य शर्तें निर्धारित हैं:</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="9,0,0"><strong data-path-to-node="9,0,0" data-index-in-node="0">सधवा स्थिति और पुत्र की मौजूदगी:</strong> मातामह श्राद्ध केवल उसी स्त्री के पिता के निमित्त निकाला जाता है, जिसका पति और पुत्र दोनों जीवित हों. यदि दोनों में से किसी एक का भी निधन हो चुका हो, तो मातामह श्राद्ध का तर्पण नहीं किया जाता.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="9,1,0"><strong data-path-to-node="9,1,0" data-index-in-node="0">पुत्री के घर के अन्न-जल का शास्त्रीय पक्ष:</strong> सामान्यतः भारतीय परंपरा में पिता द्वारा विवाहिता पुत्री के घर का अन्न-जल ग्रहण करना वर्जित माना गया है. परंतु देहावसान के उपरांत उसी पुत्री और उसके पुत्र (दोहित्र) द्वारा किए गए तर्पण से मृत आत्मा परम तृप्ति को प्राप्त करती है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="9,2,0"><strong data-path-to-node="9,2,0" data-index-in-node="0">दत्तक पुत्र का नियम:</strong> प्राचीन परंपरा के अनुसार यदि किसी की स्वयं की संतान न हो, तो वे दत्तक पुत्र गोद लेते थे ताकि मृत्यु के उपरांत पिंडदान हो सके. शास्त्रों के अनुसार दत्तक पुत्र दो पीढ़ी तक श्राद्ध करने का अधिकारी होता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;" data-path-to-node="11">दूसरी पीढ़ी करती है तर्पण और पिंडदान</h2>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="12">दिवंगत परिजन के कुल में यदि पुत्र न हो, तो दूसरी पीढ़ी यानी लड़की की संतान (नाती) पिंडदान कर सकती है. चूँकि जीवनकाल में कन्या के घर का भोजन वर्जित माना जाता है, इसलिए मातामह श्राद्ध के विशिष्ट दिन नाती द्वारा किया गया तर्पण नाना-नानी की आत्मा को सीधे शांति और संतुष्टि प्रदान करता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;" data-path-to-node="14">मातृ ऋण और मातृ दोष से मिलती है मुक्ति</h2>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="15">माता पक्ष यानी माँ और नानी के निमित्त यह श्राद्ध करने से जातक को <strong data-path-to-node="15" data-index-in-node="65">मातृ ऋण से मुक्ति</strong> मिलती है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="16,0"><strong data-path-to-node="16,1" data-index-in-node="2">ज्योतिषाचार्य, डा. अनीष व्यास के अनुसार </strong>"मातामह श्राद्ध का दिन मातृ पितरों को समर्पित है. जो लोग माता पक्ष का विधिपूर्वक श्राद्ध नहीं करते, उन्हें मातृ दोष का भागी बनना पड़ता है. इस दिन श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण से मातृ शक्ति प्रसन्न होकर कुल वृद्धि, सुख-सौभाग्य और अक्षय समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं."</p>
<h2 style="text-align: justify;" data-path-to-node="18">क्या महिलाएं कर सकती हैं श्राद्ध और पिंडदान?</h2>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="19">परिवार में पुरुष सदस्य, पुत्र अथवा पौत्र के न होने पर महिलाओं द्वारा अंतिम संस्कार या श्राद्ध कर्म करने को लेकर अक्सर भ्रम रहता है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="20">ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास स्पष्ट करते हैं कि विषम परिस्थितियों में कन्या अथवा धर्मपत्नी द्वारा श्राद्ध कर्म करना अंतिम और शास्त्र-सम्मत विकल्प है. <strong data-path-to-node="20" data-index-in-node="150">'धर्म सिंधु'</strong>, <strong data-path-to-node="20" data-index-in-node="164">'मनुस्मृति'</strong> और <strong data-path-to-node="20" data-index-in-node="179">'गरुड़ पुराण'</strong> जैसे प्रमुख हिंदू धर्म ग्रंथ विशेष परिस्थितियों में महिलाओं को पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने का स्पष्ट अधिकार प्रदान करते हैं.</p>
<h3 style="text-align: justify;" data-path-to-node="22">श्राद्ध कर्म में इन 3 का है सर्वाधिक महत्व</h3>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="23">शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म में तीन तत्व अत्यंत पवित्र और फलदायी माने गए हैं:</p>
<ul style="text-align: justify;">
<li data-path-to-node="24,0,0"><strong data-path-to-node="24,0,0" data-index-in-node="0">दौहित्र (पुत्री का पुत्र)</strong></li>
<li data-path-to-node="24,1,0"><strong data-path-to-node="24,1,0" data-index-in-node="0">कुतप काल (अपराह्न का समय)</strong></li>
<li data-path-to-node="24,2,0"><strong data-path-to-node="24,2,0" data-index-in-node="0">तिल (विशेषकर काला तिल)</strong></li>
</ul>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="25">श्राद्ध कर्म के दौरान क्रोध, उतावलापन और अशांत मन पूर्णतः वर्जित है. केवल शांत चित्त, प्रसन्नता और सच्ची श्रद्धा से किया गया कर्म ही पितरों तक पहुँचता है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="26">धर्मशास्त्रीय ग्रंथ <strong data-path-to-node="26" data-index-in-node="20">'सिद्धांत शिरोमणि'</strong> एवं <strong data-path-to-node="26" data-index-in-node="43">अथर्ववेद</strong> के अनुसार, श्राद्ध कर्म वेद-सम्मत होने के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रामाणिक है. कन्या राशि में सूर्य के संचरण काल में पितरों के निमित्त अर्पित भोज्य सामग्री अक्षय फल देने वाली मानी गई है. पितृ पक्ष और मातामह श्राद्ध का यह पावन काल यज्ञ के समान पुण्य फलदायी होता है, जिससे जातक को दीर्घायु, सुयोग्य संतान, यश, कीर्ति, बल, लक्ष्मी और धन-धान्य की प्राप्ति होती है.</p>
<h4 class="abp-article-title"><a href="https://www.abplive.com/lifestyle/religion/navratri-2026-kalash-sthapana-puja-for-office-goers-3198468">Navratri 2026: दोनों ऑफिस जाते हैं तो घर में कलश स्थापना कैसे करें?</a></h4>
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Source Credit: abplive.com
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