Explained: आशुतोष रांका-सौरव दास को पुलिस कब छोड़ेगी? प्रिवेंशन और सामान्य अरेस्ट में अंतर समझें
14 Oct 2026, 07:08 PM

Explained: आशुतोष रांका-सौरव दास को पुलिस कब छोड़ेगी? प्रिवेंशन और सामान्य अरेस्ट में अंतर समझें

ABP News
@abpnews
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="0">दिल्ली प्रोटेस्ट को लेकर दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के तीन सदस्य आशुतोष रांका, सौरव दास और अजिंक्या शिंदे को आज सुबह गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के बाद तीनों को SEM कोर्ट में पेश किया गया, जहां कोर्ट ने आशुतोष रांका, सौरव दास को पांच दिनों की पुलिस न्यायिक हिरासत में भेज दिया. इन तीनों को दिल्ली पुलिस ने प्रिवेंटिव अरेस्ट किया था. पुलिस का कहना है कि ये तीनों बिना इजाजत जंतर मंतर पर पहुंचे गए थे और प्रदर्शन करने लगे थे जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने तीनों को हिरासत में लिया. </p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="0">अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इन तीनों को कब छोड़ा जाएगा और ये डिटेंशन प्रिवेशन क्या है. ये आम गिरफ्तारी से अलग कैसे है. आइए समझते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="0">दरअसल प्रिवेंटिव अरेस्ट एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति को अपराध करने से पहले ही हिरासत में ले लिया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए अपराध के लिए सजा देना नहीं होता, बल्कि समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी संभावित अपराध या खतरे को रोकने के लिए उसे एहतियातन हिरासत में रखना होता है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="0"><strong>प्रिवेंटिव अरेस्ट को समझिए</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="3">समान्य कानूनी प्रक्रिया में किसी व्यक्ति को तब गिरफ्तार किया जाता है जब उसने कोई अपराध किया हो या उस पर अपराध करने का पुख्ता संदेह हो. लेकिन प्रिवेंटिव अरेस्ट में केवल इस आशंका या अंदेशे के आधार पर कार्रवाई की जाती है कि वह व्यक्ति भविष्य में राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या शांति के लिए खतरा पैदा कर सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="4">भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 में प्रिवेंटिव अरेस्ट से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं. इसके तहत राज्य को यह अधिकार मिलता है कि वह सुरक्षा, राष्ट्रीय अखंडता और सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल के एक निश्चित अवधि तक हिरासत में रख सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="4"><strong data-path-to-node="6" data-index-in-node="0">सामान्य गिरफ्तारी और प्रिवेंटिव अरेस्ट में अंतर</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="7">हालांकि दोनों ही प्रक्रियाओं में व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित होती है, लेकिन इनके उद्देश्य, प्रक्रिया और कानूनी अधिकारों में बड़ा अंतर है.</p>
<table style="height: 288px;" data-path-to-node="8">
<thead>
<tr style="height: 22px;">
<td style="height: 22px; width: 126.998px;"><strong>आधार / पहलू</strong></td>
<td style="height: 22px; width: 271.657px;"><strong>सामान्य गिरफ्तारी </strong></td>
<td style="height: 22px; width: 411.439px;"><strong>निवारक निरोध </strong></td>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr style="height: 22px;">
<td style="height: 22px; width: 126.998px;"><span data-path-to-node="8,1,0,0"><strong data-path-to-node="8,1,0,0" data-index-in-node="0">मुख्य उद्देश्य</strong></span></td>
<td style="height: 22px; width: 271.657px;"><span data-path-to-node="8,1,1,0">किए जा चुके अपराध के लिए दंड देना </span></td>
<td style="height: 22px; width: 411.439px;"><span data-path-to-node="8,1,2,0">भविष्य में होने वाले संभावित अपराध को रोकना</span></td>
</tr>
<tr style="height: 22px;">
<td style="height: 22px; width: 126.998px;"><span data-path-to-node="8,2,0,0"><strong data-path-to-node="8,2,0,0" data-index-in-node="0">अपराध की स्थिति</strong></span></td>
<td style="height: 22px; width: 271.657px;"><span data-path-to-node="8,2,1,0">अपराध पहले ही घटित हो चुका होता है.</span></td>
<td style="height: 22px; width: 411.439px;"><span data-path-to-node="8,2,2,0">केवल अपराध होने की आशंका या अंदेशा होता है.</span></td>
</tr>
<tr style="height: 67px;">
<td style="height: 67px; width: 126.998px;"><span data-path-to-node="8,3,0,0"><strong data-path-to-node="8,3,0,0" data-index-in-node="0">24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी</strong></span></td>
<td style="height: 67px; width: 271.657px;"><span data-path-to-node="8,3,1,0">गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है.</span></td>
<td style="height: 67px; width: 411.439px;"><span data-path-to-node="8,3,2,0">इसमें सामान्यतः 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का अधिकार लागू नहीं होता.</span></td>
</tr>
<tr style="height: 44px;">
<td style="height: 44px; width: 126.998px;"><span data-path-to-node="8,4,0,0"><strong data-path-to-node="8,4,0,0" data-index-in-node="0">हिरासत की अवधि</strong></span></td>
<td style="height: 44px; width: 271.657px;"><span data-path-to-node="8,4,1,0">पुलिस कस्टडी या ज्यूडिशियल कस्टडी कोर्ट के आदेश पर तय होती है.</span></td>
<td style="height: 44px; width: 411.439px;"><span data-path-to-node="8,4,2,0">बिना किसी सलाहकार बोर्ड  की समीक्षा के शुरुआत में अधिकतम 3 महीने तक रखा जा सकता है।</span></td>
</tr>
<tr style="height: 44px;">
<td style="height: 44px; width: 126.998px;"><span data-path-to-node="8,5,0,0"><strong data-path-to-node="8,5,0,0" data-index-in-node="0">वकील से सलाह का अधिकार</strong></span></td>
<td style="height: 44px; width: 271.657px;"><span data-path-to-node="8,5,1,0">आरोपी को अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने और बचाव का पूरा अधिकार होता है.</span></td>
<td style="height: 44px; width: 411.439px;"><span data-path-to-node="8,5,2,0">इसमें कानूनी सहायता और वकील से मिलने के अधिकार सीमित हो सकते हैं.</span></td>
</tr>
<tr style="height: 67px;">
<td style="height: 67px; width: 126.998px;"><span data-path-to-node="8,6,0,0"><strong data-path-to-node="8,6,0,0" data-index-in-node="0">जमानत</strong></span></td>
<td style="height: 67px; width: 271.657px;"><span data-path-to-node="8,6,1,0">नियमित जमानत या अंतरिम जमानत का प्रावधान होता है।</span></td>
<td style="height: 67px; width: 411.439px;"><span data-path-to-node="8,6,2,0">जमानत की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है; समीक्षा केवल एडवाइजरी बोर्ड या उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करके हो सकती है.</span></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h3 style="text-align: justify;" data-path-to-node="10"><strong data-path-to-node="10" data-index-in-node="0">इससे जुड़े कानूनी संरक्षण और सीमाएं</strong></h3>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="11">हालांकि यह कानून राज्य (सरकार) को व्यापक अधिकार देता है, फिर भी दुरुपयोग रोकने के लिए संविधान में कुछ संवैधानिक सुरक्षा कवच दिए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="12,0,0"><strong data-path-to-node="12,0,0" data-index-in-node="0">कारण बताने का अधिकार:</strong> हिरासत में लिए गए व्यक्ति को जल्द प्रिवेंटिव अरेस्ट के आधार बताए जाने चाहिए, जब तक कि ऐसा करना सार्वजनिक हित के खिलाफ न हो.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="12,1,0"><strong data-path-to-node="12,1,0" data-index-in-node="0">सलाहकार बोर्ड:</strong> यदि किसी व्यक्ति को 3 महीने से अधिक समय तक हिरासत में रखना है, तो इसके लिए एक सलाहकार बोर्ड (जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या समकक्ष सदस्य होते हैं) की मंजूरी आवश्यक होती है.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="12,2,0"><strong data-path-to-node="12,2,0" data-index-in-node="0">अभ्यावेदन (Representation) का अधिकार:</strong> हिरासत में लिए गए व्यक्ति को निरोध आदेश (Detention Order) के खिलाफ अपना पक्ष रखने या आवेदन देने का अवसर दिया जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;" data-path-to-node="15">संक्षेप में कहें तो, सामान्य गिरफ्तारी "अतीत के कार्यों" और अपराधों का न्याय करने की प्रक्रिया है, जबकि प्रिवेंटिव अरेस्ट "भविष्य की आशंकाओं" को रोकने के लिए अपनाया जाने वाला एक असाधारण उपाय है.</p>
Source Credit: abplive.com
Read Full Story
3

Comments (0)

Login to join the conversation