03 Nov 2026, 04:57 PM
Govatsa Dwadashi 2026: गाय-बछड़े की पूजा, संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है यह पावन व्रत
ABP News
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<p style="text-align: justify;"><strong>Govatsa Dwadashi 2026: </strong>कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि वात्सल्य, मातृत्व और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है. उत्तर भारत में इसे बछ बारस, जबकि महाराष्ट्र और गुजरात में वसु बारस व वाघ बारस के रूप में श्रद्धा से मनाया जाता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">पांच दिवसीय दीवाली उत्सव का शुभारंभ भी इसी पावन दिन से होता है. इस साल 2026 में यह पवित्र पर्व 5 नवंबर (गुरुवार) को मनाया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/HT0bHTAjhV8" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गोवत्स द्वादशी 2026: तिथि व शुभ मुहूर्त</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>द्वादशी तिथि का आरंभ:</strong> 5 नवंबर 2026, सुबह 10:35 बजे</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>द्वादशी तिथि की समाप्ति:</strong> 6 नवंबर 2026, सुबह 10:30 बजे</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय (प्रदोष काल):</strong> सायंकाल गोधूलि वेला में पूजा करना सबसे शुभ और फलदायी माना गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्यों खास है यह पर्व?</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संतान की दीर्घायु और रक्षा:</strong> माताएं अपने बच्चों के आरोग्य, संकटों से सुरक्षा और लंबी उम्र की कामना के साथ यह निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गौ-सेवा और मातृत्व का सम्मान:</strong> सनातन धर्म में गाय में समस्त देवी-देवताओं का वास माना गया है. इस दिन बछड़े सहित गाय की सेवा कर उनके प्रति आभार प्रकट किया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दिवाली का स्वागत:</strong> घरों में दीप प्रज्वलित कर धनतेरस से पहले ही उत्सव का उल्लास शुरू हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सरल व प्रामाणिक पूजा विधि:</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शृंगार व स्नान:</strong> सबुह नहाकर साफ कपड़े पहनें, गाय और बछड़े को जल से नहाकर हल्दी, रोली और चंदन का तिलक लगाएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>माल्यार्पण व अर्घ्य:</strong> दोनों को फूलों की माला पहनाएं, धूप-दीप दिखाएं और तांबे के लोटे से अर्घ्य दें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भोग अर्पण:</strong> गाय-बछड़े को भीगा हुआ बाजरा, मोठ, अंकुरित चना और गुड़ प्रेमपूर्वक खिलाएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परिक्रमा:</strong> भावपूर्वक सात या तीन बार परिक्रमा करें और बछ बारस की कथा सुनें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमर ममता की कथा: बछ बारस की पौराणिक कहानी:</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार ने गांव में बड़ा तालाब खुदवाया, लेकिन कई साल बीतने पर भी उसमें पानी नहीं भरा. ज्योतिषी की सलाह पर साहूकार ने अंधविश्वास में आकर बछ बारस के दिन अपने बड़े पोते की बलि दे दी और अपनी बहू को मायके भेज दिया. बलि देते ही तालाब लबालब भर गया.</p>
<p style="text-align: justify;">जब बहू मायके से लौटी, तो उसने बछ बारस पर तालाब और गाय-बछड़े की पूजा की. जल अर्पण करते हुए उसने कहा <strong>"लार-कांस पूजूं, वीरा की पूजूं, हंसता-खेलता मेरा लाल आवे."</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गोमाता के आशीर्वाद और मां की पुकार से उसका मृत पुत्र तालाब से जीवित और मुस्कुराता हुआ बाहर आ गया. साहूकार ने पश्चाताप कर अपनी भूल स्वीकारी. तभी से यह विश्वास दृढ़ हुआ कि गोवत्स पूजन संतान को अकाल संकट से बचाकर दीर्घायु प्रदान करता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>उद्यापन विधि: ऐसे पूर्ण करें अपना व्रत:</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सामग्री:</strong> सूत की अटी, बाजरे या बेसन के लड्डू, दक्षिणा और एक सुहाग साड़ी-ब्लाउज.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बायना निकालना:</strong> एक थाली में साड़ी, मिठाई और दक्षिणा रखें. हाथ में जल लेकर दो बार फेरते हुए (मिनसकर) सास या किसी पूज्य सुहागन महिला के चरण छूकर आशीर्वाद लें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पारणा:</strong> स्वयं भी बिना चाकू से कटा हुआ सात्विक बाजरा-मोठ का भोजन ग्रहण कर व्रत संपन्न करें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.<br /></strong></p>
<p style="text-align: justify;">पांच दिवसीय दीवाली उत्सव का शुभारंभ भी इसी पावन दिन से होता है. इस साल 2026 में यह पवित्र पर्व 5 नवंबर (गुरुवार) को मनाया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/HT0bHTAjhV8" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गोवत्स द्वादशी 2026: तिथि व शुभ मुहूर्त</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>द्वादशी तिथि का आरंभ:</strong> 5 नवंबर 2026, सुबह 10:35 बजे</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>द्वादशी तिथि की समाप्ति:</strong> 6 नवंबर 2026, सुबह 10:30 बजे</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय (प्रदोष काल):</strong> सायंकाल गोधूलि वेला में पूजा करना सबसे शुभ और फलदायी माना गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्यों खास है यह पर्व?</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संतान की दीर्घायु और रक्षा:</strong> माताएं अपने बच्चों के आरोग्य, संकटों से सुरक्षा और लंबी उम्र की कामना के साथ यह निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गौ-सेवा और मातृत्व का सम्मान:</strong> सनातन धर्म में गाय में समस्त देवी-देवताओं का वास माना गया है. इस दिन बछड़े सहित गाय की सेवा कर उनके प्रति आभार प्रकट किया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दिवाली का स्वागत:</strong> घरों में दीप प्रज्वलित कर धनतेरस से पहले ही उत्सव का उल्लास शुरू हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सरल व प्रामाणिक पूजा विधि:</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शृंगार व स्नान:</strong> सबुह नहाकर साफ कपड़े पहनें, गाय और बछड़े को जल से नहाकर हल्दी, रोली और चंदन का तिलक लगाएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>माल्यार्पण व अर्घ्य:</strong> दोनों को फूलों की माला पहनाएं, धूप-दीप दिखाएं और तांबे के लोटे से अर्घ्य दें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भोग अर्पण:</strong> गाय-बछड़े को भीगा हुआ बाजरा, मोठ, अंकुरित चना और गुड़ प्रेमपूर्वक खिलाएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परिक्रमा:</strong> भावपूर्वक सात या तीन बार परिक्रमा करें और बछ बारस की कथा सुनें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमर ममता की कथा: बछ बारस की पौराणिक कहानी:</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार ने गांव में बड़ा तालाब खुदवाया, लेकिन कई साल बीतने पर भी उसमें पानी नहीं भरा. ज्योतिषी की सलाह पर साहूकार ने अंधविश्वास में आकर बछ बारस के दिन अपने बड़े पोते की बलि दे दी और अपनी बहू को मायके भेज दिया. बलि देते ही तालाब लबालब भर गया.</p>
<p style="text-align: justify;">जब बहू मायके से लौटी, तो उसने बछ बारस पर तालाब और गाय-बछड़े की पूजा की. जल अर्पण करते हुए उसने कहा <strong>"लार-कांस पूजूं, वीरा की पूजूं, हंसता-खेलता मेरा लाल आवे."</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गोमाता के आशीर्वाद और मां की पुकार से उसका मृत पुत्र तालाब से जीवित और मुस्कुराता हुआ बाहर आ गया. साहूकार ने पश्चाताप कर अपनी भूल स्वीकारी. तभी से यह विश्वास दृढ़ हुआ कि गोवत्स पूजन संतान को अकाल संकट से बचाकर दीर्घायु प्रदान करता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>उद्यापन विधि: ऐसे पूर्ण करें अपना व्रत:</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सामग्री:</strong> सूत की अटी, बाजरे या बेसन के लड्डू, दक्षिणा और एक सुहाग साड़ी-ब्लाउज.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बायना निकालना:</strong> एक थाली में साड़ी, मिठाई और दक्षिणा रखें. हाथ में जल लेकर दो बार फेरते हुए (मिनसकर) सास या किसी पूज्य सुहागन महिला के चरण छूकर आशीर्वाद लें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पारणा:</strong> स्वयं भी बिना चाकू से कटा हुआ सात्विक बाजरा-मोठ का भोजन ग्रहण कर व्रत संपन्न करें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.<br /></strong></p>
Source Credit: abplive.com
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