जिस पिता से जिंदगी भर नहीं बनी, क्या उनका श्राद्ध करना जरूरी है?
08 Oct 2026, 10:21 AM

जिस पिता से जिंदगी भर नहीं बनी, क्या उनका श्राद्ध करना जरूरी है?

ABP News
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<p style="text-align: justify;"><strong>Pitru Paksha:</strong> पिता के जाने के बाद घर में मातम तो होता है, लेकिन कई बार दुख से ज्यादा पुरानी कड़वाहट हावी हो जाती है. किसी को पिता के ताने याद आते हैं. किसी को अपने सपनों पर लगी रोक सालती है. कई लोगों को वह वक्त याद आता है, जब सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत थी और पिता ने मुंह मोड़ लिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">अब परिवार श्राद्ध करने का दबाव बना रहा है. रिश्तेदार कहते हैं कि बेटा होने के नाते यह करना ही पड़ेगा. ऐसे में मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस इंसान ने जीते जी कभी साथ नहीं दिया, उसके जाने के बाद यह सब क्यों करें?</p>
<h3 style="text-align: justify;">क्या श्राद्ध का मतलब पिता की गलतियों को सही मानना है</h3>
<p><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/qC5oxd58sbM?si=DDvaIqISPSuRc4ih" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p style="text-align: justify;">यह सवाल सिर्फ पूजा-पाठ का नहीं है. इसका सीधा ताल्लुक आपके आत्मसम्मान से है. बहुत से लोगों को लगता है कि श्राद्ध करने का मतलब पिता को माफ कर देना है. हिंदू परंपरा में पितृकर्म को बेटे का दायित्व माना गया है. लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पिता का हर बर्ताव सही था.</p>
<p style="text-align: justify;">धार्मिक रस्म और आपका निजी दर्द, दोनों अलग बातें हैं. किसी की आत्मा की शांति के लिए हाथ जोड़ना और उसके गलत व्यवहार को सही ठहराना एक बात नहीं हो सकती. आप अपने जख्मों को भुलाए बिना भी यह कर्म कर सकते हैं.</p>
<h3 style="text-align: justify;">धर्मग्रंथ क्या कहते हैं और परिवार के दबाव की सीमा क्या है</h3>
<p style="text-align: justify;">शास्त्रों में पितृकर्म को परिवार चलाने वाले का कर्तव्य बताया गया है. मनुस्मृति में अन्न, जल और फल से तर्पण की बात कही गई है. यह नियम व्यवस्था बनाए रखने के लिए था. </p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए यह कहना गलत है कि पहले मन का सारा गुस्सा खत्म करो, तभी पूजा में बैठो. यह बात परिवार की अपनी हो सकती है, लेकिन इसे धर्म का आखिरी फैसला नहीं माना जा सकता.</p>
<h3 style="text-align: justify;">रामायण की वो कहानी, जो लोग अक्सर गलत सुनाते हैं</h3>
<p style="text-align: justify;">इस मामले में अक्सर रामायण का उदाहरण दिया जाता है. भरत जब वन जाकर श्रीराम को राजा दशरथ के निधन की खबर देते हैं, तो राम गहरे सदमे में आ जाते हैं. वे नदी किनारे खड़े होकर पिता को जल देते हैं. राजमहल से दूर, वे जंगल के बेर और कंदमूल से ही पिंडदान करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस प्रसंग से यह तो साफ है कि श्राद्ध के लिए भारी-भरकम खर्च या आडंबर की जरूरत नहीं होती. जो पास है, उसी से काम चल जाता है. लेकिन इस कहानी की एक सीमा है. भगवान राम और दशरथ के बीच गहरा लगाव था. इसे उन रिश्तों की मिसाल नहीं बनाया जा सकता, जहां पूरी जिंदगी सिर्फ नफरत और तकरार रही हो.</p>
<h3 style="text-align: justify;">आत्मा की शांति अलग बात है और माफी बिल्कुल अलग</h3>
<p style="text-align: justify;">अगर आप श्राद्ध करने का मन बना भी लें, तो इसका मतलब यह नहीं कि पिता सही हो गए. रोज-रोज के झगड़े और मानसिक प्रताड़ना में जमीन-आसमान का फर्क होता है. कड़वे अनुभवों के बाद सब कुछ भूल जाना किसी के बस में नहीं होता. श्राद्ध का लोटा उठाने से पुराने घाव नहीं भरते.</p>
<p style="text-align: justify;">यह बात अपने जेहन में साफ रखिए. यह पूजा पिता के गलत फैसलों पर कोई मुहर नहीं है. यह सिर्फ एक गुजरे हुए इंसान के प्रति औपचारिकता भर है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">जब मन गवाही न दे और पैसे की तंगी हो, तब क्या करें</h3>
<p style="text-align: justify;">अगर पिता की याद से सिर्फ तकलीफ होती है, तो खुद पर जबरदस्ती मत कीजिए. पहले यह समझिए कि असल दिक्कत क्या है. क्या पैसों की तंगी है? पूजा की रस्में समझ नहीं आ रहीं? या फिर उनका चेहरा याद आते ही दम घुटने लगता है?</p>
<p style="text-align: justify;">अगर भारी-भरकम कर्मकांड नहीं झेल पा रहे, तो किसी सीधे-सादे पंडित से बात करें. उनसे कहें कि बिना तामझाम के सबसे आसान तरीका बताएं. अगर मन बिल्कुल ही राजी न हो, तो उनके नाम पर किसी भूखे को खाना खिला दें. यह भी एक तरीका है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">क्या श्राद्ध न करने से घर बर्बाद हो जाएगा</h3>
<p style="text-align: justify;">हमारे समाज में डर बहुत जल्दी बेचा जाता है. लोग डराते हैं कि श्राद्ध नहीं किया तो नौकरी चली जाएगी, बीमारियां घेर लेंगी या खानदान पर विपत्ति आ जाएगी. धर्म को इस तरह खौफ का जरिया बनाना पूरी तरह गलत है. ऐसी बातों का कोई सिर-पैर नहीं होता.</p>
<p style="text-align: justify;">परंपरा अपनी जगह है और आपका सच अपनी जगह. अगर आप यह रस्म निभाना चाहते हैं, तो एक औपचारिकता समझकर निभा लीजिए. लेकिन इसके लिए अपने अतीत से झूठ बोलने या खुद को अपराधी मानने की रत्ती भर जरूरत नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.</strong></p>
Source Credit: abplive.com
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