06 Nov 2026, 03:52 PM
Dhanteras 2026: राजा हिम की पुत्रवधू की वो सूझबूझ, जिसने टाल दिया था काल
ABP News
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<p style="text-align: justify;"><strong>Dhanteras 2026: </strong>कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानी धनतेरस केवल नई धातु, बर्तन या आभूषण खरीदने का दिन नहीं है. इस पर्व का एक बहुत गहरा और आध्यात्मिक पहलू भी है, जो अकाल मृत्यु के भय को मिटाने से जुड़ा है. धनतेरस की शाम घर के मुख्य द्वार पर यमराज के निमित्त दीपक जलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे 'यम दीपदान' कहा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? शास्त्रों और लोक कथाओं में वर्णित राजा हिम की पुत्रवधू की सूझबूझ की यह गाथा बताती है कि कैसे एक स्त्री की निष्ठा और बुद्धि ने स्वयं काल (यमराज) को भी खाली हाथ लौटने पर विवश कर दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;"><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/B1-FcjjDGrs" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कुंडली का वह भयंकर दोष: विवाह के चौथे दिन मृत्यु का साया</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पौराणिक आख्यानों के अनुसार, राजा हिम के घर जब पुत्र का जन्म हुआ, तो पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया. राजा ने राज्य के जाने-माने ज्योतिषियों को राजकुमार की कुंडली देखने के लिए आमंत्रित किया. ज्योतिषियों ने बालक के भविष्य का अध्ययन कर एक अत्यंत चिंताजनक भविष्यवाणी की.</p>
<p style="text-align: justify;">राजकुमार की कुंडली में एक गंभीर योग था विवाह के ठीक चौथे दिन सर्प दंश (सांप के काटने) से उसकी असामयिक मृत्यु निश्चित थी.</p>
<p style="text-align: justify;">यह सुनकर राजा हिम बहुत व्यथित हुए, लेकिन होनी को कौन टाल सकता था. समय बीतता गया और राजकुमार युवा हुआ. समय आने पर उसका विवाह एक अत्यधिक गुणवती, धर्मपरायण और बुद्धिमती कन्या से हुआ. विवाह के तुरंत बाद जब नवविवाहिता वधू को अपने पति की इस भयावह भविष्यवाणी की जानकारी मिली, तो उसने हार मानने या विलाप करने के बजाय अपने सुहाग की रक्षा के लिए एक दृढ़ संकल्प लिया.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सोने-चांदी की चमक और दीयों का घेरा: एक अनूठी योजना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विवाह की चौथी रात आई वही रात, जो राजकुमार के जीवन की अंतिम रात मानी जा रही थी. राजमहल में सन्नाटा था, लेकिन वधू ने पूरी योजना तैयार कर ली थी. उसने अपने पति को शयनकक्ष में सोने नहीं दिया और उन्हें पूरी रात जागते रहने के लिए कहा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>राजकुमारी ने महल के मुख्य प्रवेश द्वार पर:</strong></p>
<ul style="text-align: justify;">
<li>अपने और राजकोष के समस्त सोने, चांदी के आभूषणों और बहुमूल्य रत्नों का एक विशाल ढेर लगा दिया.</li>
<li>गहनों के इस ढेर के चारों तरफ मिट्टी के अनगिनत दीप प्रज्वलित कर दिए.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">देखते ही देखते पूरा मार्ग तीव्र दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा. इसके बाद, पति की नींद भगाने और उनका ध्यान केंद्रित रखने के लिए वधू ने उन्हें धर्म, नीति और ज्ञान की कहानियां सुनाना और सुरीले भजनों को गाना शुरू कर दिया.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जब यमराज की आंखें चौंधिया गईं:</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आधी रात के गहन अंधकार में मृत्यु के देवता यमराज ने अपने वचन के अनुसार एक भयानक विषैले सर्प का रूप धारण किया और राजकुमार के प्राण हरने के लिए महल की ओर बढ़े.</p>
<p style="text-align: justify;">जैसे ही यमराज महल के मुख्य द्वार पर पहुंचे, वहां का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए. वहां रखे सोने-<a title="चांदी" href="https://www.abplive.com/silver-prices" data-type="interlinkingkeywords">चांदी</a> के आभूषणों के परावर्तन और चारों ओर प्रज्वलित सैकड़ों दीपों के तीव्र प्रकाश ने सर्परूपी यमराज की आंखों को चौंधिया दिया. प्रकाश इतना तीव्र था कि वे महल के भीतर प्रवेश करने का मार्ग ही नहीं देख पाए.</p>
<p style="text-align: justify;">विवश होकर यमराज प्रवेश द्वार पर रखे उसी आभूषणों के ढेर पर कुंडली मारकर बैठ गए.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गीतों और कथाओं में बीती रात, टल गया काल का मुहूर्त:</strong></p>
<p style="text-align: justify;">द्वार पर बैठे यमराज के कानों में भीतर से आती राजकुमारी की मधुर आवाज गूंजने लगी. वह अपने पति को पूरे मनोयोग से कथाएं सुना रही थी और ईश्वर की वंदना कर रही थी. राजकुमारी के ज्ञानवर्धक प्रसंगों और सुरीले सुरों में यमराज ऐसे मंत्रमुग्ध हुए कि उन्हें समय बीतने का भान ही नहीं रहा.</p>
<p style="text-align: justify;">बातचीत और कथा-सुनने में ही पूरी रात बीत गई और पूर्व दिशा में भोर की पहली किरण फूट पड़ी. भोर होते ही ज्योतिषीय गणना के अनुसार राजकुमार की मृत्यु का वह संकटकालीन मुहूर्त हमेशा के लिए टल गया.</p>
<p style="text-align: justify;">क्योंकि काल का निर्धारित समय समाप्त हो चुका था, इसलिए यमराज को बिना प्राण लिए ही खाली हाथ यमलोक लौटना पड़ा. इस प्रकार, एक नवविवाहिता की अडिग आस्था, प्रेम और बुद्धिमत्ता ने काल के फंदे से अपने पति के प्राण छीन लिए.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धनतेरस पर क्यों जरूरी है 'यम दीपदान'?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जिस दिन यह घटना घटी, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि थी. तभी से धनतेरस की शाम को यम दीपदान करने की अटूट परंपरा की शुरुआत हुई.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किस दिशा में जलाएं:</strong> यह दीप हमेशा घर के मुख्य द्वार के बाहर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है, क्योंकि दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>चार मुखी दीपक का महत्व:</strong> अक्सर इस दिन आटे या मिट्टी का चौमुखी (चार बत्तियों वाला) दीपक जलाया जाता है, जिसमें सरसों या तिल का तेल डाला जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">इस दीपदान के पीछे का मुख्य उद्देश्य परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु, गंभीर व्याधियों और अनहोनी के भय से मुक्ति दिलाना है. धनतेरस पर की गई आभूषणों की खरीदारी केवल समृद्धि का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह कथा दर्शाती है कि धातु और दीपों का प्रकाश नेगेटिव एनर्जी और मृत्यु तुल्य संकट को भी जीवन से दूर रखने का सामर्थ्य रखता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.<br /></strong></p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? शास्त्रों और लोक कथाओं में वर्णित राजा हिम की पुत्रवधू की सूझबूझ की यह गाथा बताती है कि कैसे एक स्त्री की निष्ठा और बुद्धि ने स्वयं काल (यमराज) को भी खाली हाथ लौटने पर विवश कर दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;"><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/B1-FcjjDGrs" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कुंडली का वह भयंकर दोष: विवाह के चौथे दिन मृत्यु का साया</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पौराणिक आख्यानों के अनुसार, राजा हिम के घर जब पुत्र का जन्म हुआ, तो पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया. राजा ने राज्य के जाने-माने ज्योतिषियों को राजकुमार की कुंडली देखने के लिए आमंत्रित किया. ज्योतिषियों ने बालक के भविष्य का अध्ययन कर एक अत्यंत चिंताजनक भविष्यवाणी की.</p>
<p style="text-align: justify;">राजकुमार की कुंडली में एक गंभीर योग था विवाह के ठीक चौथे दिन सर्प दंश (सांप के काटने) से उसकी असामयिक मृत्यु निश्चित थी.</p>
<p style="text-align: justify;">यह सुनकर राजा हिम बहुत व्यथित हुए, लेकिन होनी को कौन टाल सकता था. समय बीतता गया और राजकुमार युवा हुआ. समय आने पर उसका विवाह एक अत्यधिक गुणवती, धर्मपरायण और बुद्धिमती कन्या से हुआ. विवाह के तुरंत बाद जब नवविवाहिता वधू को अपने पति की इस भयावह भविष्यवाणी की जानकारी मिली, तो उसने हार मानने या विलाप करने के बजाय अपने सुहाग की रक्षा के लिए एक दृढ़ संकल्प लिया.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सोने-चांदी की चमक और दीयों का घेरा: एक अनूठी योजना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विवाह की चौथी रात आई वही रात, जो राजकुमार के जीवन की अंतिम रात मानी जा रही थी. राजमहल में सन्नाटा था, लेकिन वधू ने पूरी योजना तैयार कर ली थी. उसने अपने पति को शयनकक्ष में सोने नहीं दिया और उन्हें पूरी रात जागते रहने के लिए कहा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>राजकुमारी ने महल के मुख्य प्रवेश द्वार पर:</strong></p>
<ul style="text-align: justify;">
<li>अपने और राजकोष के समस्त सोने, चांदी के आभूषणों और बहुमूल्य रत्नों का एक विशाल ढेर लगा दिया.</li>
<li>गहनों के इस ढेर के चारों तरफ मिट्टी के अनगिनत दीप प्रज्वलित कर दिए.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">देखते ही देखते पूरा मार्ग तीव्र दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा. इसके बाद, पति की नींद भगाने और उनका ध्यान केंद्रित रखने के लिए वधू ने उन्हें धर्म, नीति और ज्ञान की कहानियां सुनाना और सुरीले भजनों को गाना शुरू कर दिया.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जब यमराज की आंखें चौंधिया गईं:</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आधी रात के गहन अंधकार में मृत्यु के देवता यमराज ने अपने वचन के अनुसार एक भयानक विषैले सर्प का रूप धारण किया और राजकुमार के प्राण हरने के लिए महल की ओर बढ़े.</p>
<p style="text-align: justify;">जैसे ही यमराज महल के मुख्य द्वार पर पहुंचे, वहां का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए. वहां रखे सोने-<a title="चांदी" href="https://www.abplive.com/silver-prices" data-type="interlinkingkeywords">चांदी</a> के आभूषणों के परावर्तन और चारों ओर प्रज्वलित सैकड़ों दीपों के तीव्र प्रकाश ने सर्परूपी यमराज की आंखों को चौंधिया दिया. प्रकाश इतना तीव्र था कि वे महल के भीतर प्रवेश करने का मार्ग ही नहीं देख पाए.</p>
<p style="text-align: justify;">विवश होकर यमराज प्रवेश द्वार पर रखे उसी आभूषणों के ढेर पर कुंडली मारकर बैठ गए.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गीतों और कथाओं में बीती रात, टल गया काल का मुहूर्त:</strong></p>
<p style="text-align: justify;">द्वार पर बैठे यमराज के कानों में भीतर से आती राजकुमारी की मधुर आवाज गूंजने लगी. वह अपने पति को पूरे मनोयोग से कथाएं सुना रही थी और ईश्वर की वंदना कर रही थी. राजकुमारी के ज्ञानवर्धक प्रसंगों और सुरीले सुरों में यमराज ऐसे मंत्रमुग्ध हुए कि उन्हें समय बीतने का भान ही नहीं रहा.</p>
<p style="text-align: justify;">बातचीत और कथा-सुनने में ही पूरी रात बीत गई और पूर्व दिशा में भोर की पहली किरण फूट पड़ी. भोर होते ही ज्योतिषीय गणना के अनुसार राजकुमार की मृत्यु का वह संकटकालीन मुहूर्त हमेशा के लिए टल गया.</p>
<p style="text-align: justify;">क्योंकि काल का निर्धारित समय समाप्त हो चुका था, इसलिए यमराज को बिना प्राण लिए ही खाली हाथ यमलोक लौटना पड़ा. इस प्रकार, एक नवविवाहिता की अडिग आस्था, प्रेम और बुद्धिमत्ता ने काल के फंदे से अपने पति के प्राण छीन लिए.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धनतेरस पर क्यों जरूरी है 'यम दीपदान'?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जिस दिन यह घटना घटी, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि थी. तभी से धनतेरस की शाम को यम दीपदान करने की अटूट परंपरा की शुरुआत हुई.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किस दिशा में जलाएं:</strong> यह दीप हमेशा घर के मुख्य द्वार के बाहर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है, क्योंकि दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>चार मुखी दीपक का महत्व:</strong> अक्सर इस दिन आटे या मिट्टी का चौमुखी (चार बत्तियों वाला) दीपक जलाया जाता है, जिसमें सरसों या तिल का तेल डाला जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">इस दीपदान के पीछे का मुख्य उद्देश्य परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु, गंभीर व्याधियों और अनहोनी के भय से मुक्ति दिलाना है. धनतेरस पर की गई आभूषणों की खरीदारी केवल समृद्धि का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह कथा दर्शाती है कि धातु और दीपों का प्रकाश नेगेटिव एनर्जी और मृत्यु तुल्य संकट को भी जीवन से दूर रखने का सामर्थ्य रखता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.<br /></strong></p>
Source Credit: abplive.com
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